चेन्नै उपधान प्रवचन - १५/१२/२०१३


 श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:
  • "सव्व पावप्पणासणो" - पञ्च परमेष्ठि के जाप की ताकत है कि वो भूत काल में किये हुए पापो को नाश करता है, वर्त्मान में हो रहे पाप से पीछे हटाता है और भविष्य में होने वाले पापो की वृत्ति को, पापो के संस्कार को खत्म कर देता है । 
  • जैसे जैसे लाभ बढ़ता है, वैसे वैसे हमारा लोभ भी बढ़ता जाता है । लोभ की आग हमारे सारे पुण्य को, मानवभाव के समय और शक्ति को ख़त्म कर देता है । 
  • जहाँ सूर्य का प्रकाश है वहाँ रात्रि का अंधेरा नहीं है । जहां अँधेरा है वहाँ सूर्य का प्रकाश नहीं है । जहां आनंद है वहाँ लोभ नहीं है और जहां लोभ है वहा आनंद, सुख और शान्ति नहीं है । जो लोभ ग्रस्त है वो कभी आनंद नहीं पा सकता । 
  • जैन धर्म कि आस्तिकता याने भगवान ने जहाँ-जहाँ पाप कहाँ, वहा-वहा पाप मानना । रात को भले खाना पड़े लेकिन मन में यही होना चाहिए कि मै पाप कर रहा हूँ । 
  • जैन धर्म कि अनुकम्पा याने (१) without partiality (२) without condition (३) without expectation दूसरे के दुःख देखकर मन द्रवित होना, दुखी होना । चाहे वो मेरा दुश्मन,विरोधी, competitor क्यों न हो, लेकिन वो दुखी है तो मै उसका दुःख दूर करने सहायक बनू । 
  • परिग्रह संज्ञा - लोभ कषाय के दृष्टांत में मम्मण सेठ maximum है तो हम भी minimum तो है न ? लोभ करने में हम भी कुछ कम नहीं । हम भी जल्दी से कुछ छोड़ नहीं सकते है, कोई भी attractive offer आती है तो हम पूजा, सामायिक, प्रवचनादि सब छोड़कर भी वो offer स्वीकार कर लेते है । 
  • लोभ कषाय को जीतने के लिए "नमो सिद्धाणं" का जाप करो । जो सिद्ध भगवंतो को शरीर भी नहीं है, कर्म भी नहीं है, जो सभी परिग्रह से मुक्त है, जो सभी इच्छा-लोभ अपेक्षा से मुक्त है - ऐसे सिद्ध भगवंत हमारे लोभ कषाय को खत्म करे । 

    चेन्नै उपधान प्रवचन - १४/१२/२०१३


     श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:
    • अरिहन्तादि पञ्च परमेष्ठि सम्बन्धी - उनका नाम स्मरण, प्रतिमा पूजन, ध्यान इत्यादि कुछ भी याद करने से मोहनिय कर्म का क्षयोपक्षम होता है । संसार सम्बन्धी जोई भी चीज़ याद करने से मोहनिय कर्म का उदय होता है । 
    • संपत्ति  को याद करने से लोभ पैदा होता है । सम्बन्धो और स्वजनो को याद करने से स्वार्थ और क्रोध भाव पैदा होता है । संसार याने मोहनिय कर्म की लागनी - feeling का बहता बड़ा प्रभाव । 
    • रेलवे की पटरी ट्रैन को चलाती नहीं फिर भी ट्रैन को चलने में मदद करती है, वैसे प्रभु हमारे कर्मो का नाश नहीं करते है लेकिन कर्मो को नाश करने के हमारे पुरुषार्थ में उनका नाम-जाप-ध्यान सहायक बनते है । 
    • सभी पापो का बाप लोभ है, क्रोधादि में सबसे  भयंकर लोभ है । जैन होते हुए भी आदमी बूचड़खाना चलाता है, हिंसात्मक व्यापार करता है । दूसरों के साथ माया,दम्भ,कपट करता है, भाई के साथ भी संघर्ष अन्याय करता है । लोभ सर्व विनाशक है । लोभ से जीव का पुण्य,शक्ति,सभ ख़त्म हो गए । अनंतकाल के बाद मिला मानवभाव एक लोभ के कारण पापो में ख़त्म हो गया । 
    • संसारी के पेट में गया हुआ भोजन पाप में जायेंगा । साधू के पात्र में  गया हुआ भोजन साधना में जायेंगा ।
    • आपके आजुबाजु में रहनेवाले आपके स्वजन, मित्र, पडोसी, हितस्वी वर्ग को पहचान लो - वो आपके वर्त्तमान को सुधारने के नाम पर, आपके पुण्य को खत्म नहीं करते है ना ? आपके भविष्य को नहीं बिगाड़ रहे है ना ? ऐसे हितस्वी से सावधान रहना । 
    • लोभ अग्नि जैसा है - उसमे कितना भी ईंधन डालो, उसे तृप्ति ही होती नहीं । बल्कि वो ज्यादा जलता है, वैसे लोभग्रस्त लोभी को कितना भी रूपया मिले उसे तृप्ति होती ही नहीं है । बल्कि उसका लोभ दिनबदिन बढ़ता ही जाता है ।  

    चेन्नै उपधान प्रवचन - १३/१२/२०१३


    श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:

    • जब तक अंतरात्मा जागृत नहीं हुई है, जब तक विवेकदृष्टि प्राप्त नहीं हुई है, तब तक आराधना मुश्किल है और पाप प्रवृत्ति आसान है । जितनी आसानी से Remote से t.v. चालू होता है, उतनी आसानी से चरवला लेकर सामायिक करते नहीं ।  
    •   भगवान कहते है - मानव भव की प्रत्येक पल आराधना में ही जानी चाहिए । विराधना में नहीं । हम विपरीत कर रहे है कि - हमारी प्रत्येक पल विराधना से भरी है और कुछ ही क्षण आराधना में जा रही है । 
    • मानव भव का प्रत्येक पल कोहिनूर के समान है । इसलिए शास्त्रकार कहते है - एक क्षण का भी प्रमाद मत करो । एक क्षण का प्रमाद हमारी जिंदगी भर कि आराधना-साधना को निष्फल बना सकता  है  । 
    • एक बार दानादि सुकृत किया, धर्म क्रिया की, उसे जितनी बार याद करो, अनुमोदना करो, उतनी बार फल मिलता है । और एक बार पाप किया, उसे जितनी बार याद किया, उसका अभिमान किया - प्रशंशा की, उतनी बार वो पाप का दंड बढ़ता जाता है ।
    • दिया हुआ दान निष्फल नहीं जाता और पाया हुआ ज्ञान निष्फल नहीं जाता । 
    • बिना विवेक किया हुआ व्रत-नियम-पच्चक्खाण पूर्ण फल देता नहीं है । 
    • खाने का ज्यादा शौख रखनेवाला अभक्ष्य भी खाता है और ज्यादा बोलनेवाला झूठ, परनिंदा, आत्मप्रशंसा का भी बोल देता है । 
    • सब एक दूसरे के पास अधिकार कि अपेक्षा रखे तो आग लगेगी, दुखी बनेंगे । सब अपनी-अपनी फर्ज निभाने लगे तो जीवन बाग़ बन जायेगा, खुशियो से भर जायेगा । 
    • दुनियादारी की दृष्टी से, शैतान की दृष्टी से जगत को देखना, वो मिथ्यादर्शन है । प्रभुने जो दृष्टी से जगत को देखा, वो दृष्टी से जगत को देखना, वो सम्यग्दर्शन है । 


    चेन्नै उपधान प्रवचन - १२/१२/२०१३

    श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:

    • "नमो अरिहंताणं" - नमस्कार शब्द ही अहंकार-नाशक है और विनय धर्म का प्रतीक है । 
    • आप अहंकार के कारण किसी को झुकने तैयार नहीं हो, अपनी गलत मान्यता और धरना छोड़ने तैयार नहीं हो और किसी भी बात में समाधान करने की वृत्तिवाले नहीं हो तो साक्षात् अरिहंत मिलने के बाद भी कोई फायदा नहीं है । 
    • "नमो" शब्द अरिहन्तादि पांच परमेष्ठि के साथ अपनी आत्मा को जोड़ने वाला bridge है । 
    • क्रोध करने बाद हमें कभी क्रोध करने का पछतावा हुआ नहीं है । क्रोध का पछतावा हुआ तो भी ये बात  हुआ कि: (१)जितनी गर्मी-ताकत से क्रोध करना उतनी गर्मी से न हुआ (२) क्रोध करने से आया हुआ ग्राहक चला गया । (३) जो सम्बन्ध-नाता बनाने सालो बीत गए, क्रोध करने से वो नाता टूट गया । (४) क्रोध करने से मेरी इज्जत/prestige  चली गई । ये पछतावा हुआ लेकिन क्रोध करने बाद कभी ये पछतावा नहीं हुआ कि - क्रोध से मेरी आत्मा दुर्गति गामी बनी, कर्मो से भारी बनी, मेरी शांत-शुद्ध चेतना अशुद्ध और असंकलिष्ट बनी । 
    • क्रोध इतना भयंकर नहीं है, जितना क्रोध सम्बन्धी दुर्बुद्धि । क्रोध सम्बन्धी दुर्बुद्धि याने (१) क्रोध करने से पूर्व क्रोध करने जैसा लगना (२) क्रोध करते वक्त क्रोध जरुरी लगना  (३) क्रोध करने के बाद उसका पछतावा न होना
    • "नमो अरिहंताणं" पद के जाप की Real Value क्या? मेरी दुर्बुद्धि का नाश हो । जो दुर्बुद्धि (१) हमें हमारे मोक्ष से, अनंत आनंद से दूर भेज रही है (२) हमारे भाई, पिता, पुत्र, पत्नी, मित्र आदि के साथ स्वार्थ बुद्धि उत्पन्न करवाती है (३) क्रोधादि करने जैसे है ऐसी मान्यता खड़ी करती है (४) टी.वी. देखने में क्या पाप है ? इत्यादि रूपसे पाप में पापबुद्धि का नाश करती है । मनमे उठनेवाली ऐसी दुर्बुद्धि का नाश होना ही अरिहंत नमस्कार की  Real Value  है । 
    • वो ही मंत्र जाप सिद्ध होता है, जो (१) गुरु मुख से मिले (२) सभी जीवो के साथ मैत्री भाव हो (३) मन-वचन-काय से पवित्र योग हो (४) जाप करते वक्त एकाग्रता और अखंडता हो । 

    चेन्नै उपधान प्रवचन - ११/१२/२०१३

     
    श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:

    • जैसे generator electricity उत्पन्न करती है वैसे दुरभुद्धि क्रोध-मान-माया-लोभ-कषायो को उत्पन्न  करती है । 
    • अनादि काल के संस्कार से क्रोधादि कषाय करने नहीं पड़ते - हो जाते है । और दुर्बुद्धि के प्रभाव से वो क्रोधादि करने जैसे लगते है - दुनिया में रहना है तो क्रोध करना ही पड़ेगा, तो ही लोग चुप रहेंगे,  सफलता मिली तो अभिमान तो होना ही चाहिए, व्यापार में सफल होने झूठ, चोरी, प्रपंच करना तो policy है और लोभ-असंतोष रखेंगे तो ही प्रगति कर पाएंगे । ऐसी-ऐसी गलत धारणाये भी दुर्बुद्धि के प्रभाव से करने जैसी लगती है । 
    •  भगवान कहते है - जहां आत्महित है वैसी धर्म साधना में संतोष रखो । और जहाँ पाप और संकलेश है ऐसी दुन्यवी धन-साधन में संतोष रखो । 
    • गांधीजी ने कहाँ कि - अंग्रेज भले रहे, लेकिन अंग्रेज संस्कृति नहीं रहनी चाहिए । वैसे हम कहते है - क्रोधादि भले रहे लेकिन उसकी दुर्बुद्धि नहीं रहनी चाहिए कि क्रोधादि करने जैसे है । ये क्रोधादि कषायो के प्रति  प्रेम, बचाव, पक्षपात, आनंद और अहंकार न रहना चाहिए । 
    • क्रोधादि कषाय करने मात्र से सफल नहीं होते, पुण्य होगा तो ही क्रोधादि कषाय सफल बनेंगे , अन्यथा अपने किये क्रोध पर लोग हसेंगे । 
    • दुनिया के क्षेत्र में बुद्धि चाहिए, तो ही सफलता मिलेंगी । वैसे धर्म क्षेत्र में श्रद्धा होगी तो ही सफलता मिलेंगी । हमनें गड़बड़ करदी - दुनिया के क्षेत्र में हम श्रद्धा रखकर पाप कार्य में जुड़ जाते है और धर्मं क्षेत्र में बुद्धि को आगेकर, हर बात में शंका करते है । 
    • जो चीज़ मेरे पेट-शारीर को बिगाड़ती है वो चीज़ सामनेवाला कितनी भी आग्रह करे, तो भी लेनी नहीं चाहिए । शरीर से भी महान मन है । जिससे मेरा मन बिगड़े, ऐसी किसी भी आकर्षक चीज़ सामने आये उसमे आसक्त न होना ।     

    चेन्नै उपधान प्रवचन - १०/१२/२०१३

      श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:

    •  दुनिया को जीतने वाला सफल कहा जाता है । लेकिन दोषो को जीतने वाला महान कहा जाता है । 
    • अरिहंत प्रभु को दुनिया भर की सभी प्रकार की विद्या सहज सिद्ध होती है । दुनिया में सभी विद्याओ से समर्थ विद्या - प्रयत्न के प्राप्त करने योग्य विद्या एक ही है - वह है वैराग्य विद्या । 
    • वीतरागता नाम कि विद्या सिद्ध करने से केवलज्ञान रूपी फल सहज ही प्राप्त होता है । 
    • आत्मा का प्रकाश पाने के लिए, दुन्यायी सम्बन्ध और साधनो में आसक्ति से बचने के लिए, आत्मा विद्या सिद्ध करने के लिए ही साधक बनना है, दुनिया में  प्रशंशा, वाह-वाह पाने के लिए साधक नहीं बनना । 
    • दुनिया में अभय, अखेद और अद्वेष की प्राप्ति वैरागी को ही होती है । 
    •  वैरागी को दुनिया के  कोई भी घटना-प्रसंग  ख़ुशी भी नहीं कर सकता तो दुखी भी नहीं कर सकता । 
    • पांच इन्द्रियो के विषयो का ऐसा चक्कर है कि, उसमे गिरने के बाद हमारी बाहर आने की ताकत नहीं है । जब तक टी.वी., मोबाइल, ए.सी. का उपभोग नहीं  किया था, तब तक प्रॉब्लम नहीं था, लेकिन एक बार टी.वी., मोबाइल, ए.सी. का उपभोग किया तो आज वो साधन के बिना एक सेकंड भी हमें नहीं चलता है । 
    • सोने की वीटी मिलती है तो हैम कीचड़ में भी हाथ डालने तैयार है, तो किसी से हमें ज्ञान मिलता है तो वह देनेवाला कौन है वो छोड़कर, विनयपूर्वक उसके पास से ज्ञान प्राप्त करना चाहिए । 
    • गुरु को समर्पित बने बिना दुनिया में वाह-वाह मिल सकती है, आत्मा कल्याण नहीं हो सकता है ।