श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:
- "नमो अरिहंताणं" - नमस्कार शब्द ही अहंकार-नाशक है और विनय धर्म का प्रतीक है ।
- आप अहंकार के कारण किसी को झुकने तैयार नहीं हो, अपनी गलत मान्यता और धरना छोड़ने तैयार नहीं हो और किसी भी बात में समाधान करने की वृत्तिवाले नहीं हो तो साक्षात् अरिहंत मिलने के बाद भी कोई फायदा नहीं है ।
- "नमो" शब्द अरिहन्तादि पांच परमेष्ठि के साथ अपनी आत्मा को जोड़ने वाला bridge है ।
- क्रोध करने बाद हमें कभी क्रोध करने का पछतावा हुआ नहीं है । क्रोध का पछतावा हुआ तो भी ये बात हुआ कि: (१)जितनी गर्मी-ताकत से क्रोध करना उतनी गर्मी से न हुआ (२) क्रोध करने से आया हुआ ग्राहक चला गया । (३) जो सम्बन्ध-नाता बनाने सालो बीत गए, क्रोध करने से वो नाता टूट गया । (४) क्रोध करने से मेरी इज्जत/prestige चली गई । ये पछतावा हुआ लेकिन क्रोध करने बाद कभी ये पछतावा नहीं हुआ कि - क्रोध से मेरी आत्मा दुर्गति गामी बनी, कर्मो से भारी बनी, मेरी शांत-शुद्ध चेतना अशुद्ध और असंकलिष्ट बनी ।
- क्रोध इतना भयंकर नहीं है, जितना क्रोध सम्बन्धी दुर्बुद्धि । क्रोध सम्बन्धी दुर्बुद्धि याने (१) क्रोध करने से पूर्व क्रोध करने जैसा लगना (२) क्रोध करते वक्त क्रोध जरुरी लगना (३) क्रोध करने के बाद उसका पछतावा न होना
- "नमो अरिहंताणं" पद के जाप की Real Value क्या? मेरी दुर्बुद्धि का नाश हो । जो दुर्बुद्धि (१) हमें हमारे मोक्ष से, अनंत आनंद से दूर भेज रही है (२) हमारे भाई, पिता, पुत्र, पत्नी, मित्र आदि के साथ स्वार्थ बुद्धि उत्पन्न करवाती है (३) क्रोधादि करने जैसे है ऐसी मान्यता खड़ी करती है (४) टी.वी. देखने में क्या पाप है ? इत्यादि रूपसे पाप में पापबुद्धि का नाश करती है । मनमे उठनेवाली ऐसी दुर्बुद्धि का नाश होना ही अरिहंत नमस्कार की Real Value है ।
- वो ही मंत्र जाप सिद्ध होता है, जो (१) गुरु मुख से मिले (२) सभी जीवो के साथ मैत्री भाव हो (३) मन-वचन-काय से पवित्र योग हो (४) जाप करते वक्त एकाग्रता और अखंडता हो ।

No comments:
Post a Comment