चेन्नै उपधान प्रवचन - १५/१२/२०१३


 श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:
  • "सव्व पावप्पणासणो" - पञ्च परमेष्ठि के जाप की ताकत है कि वो भूत काल में किये हुए पापो को नाश करता है, वर्त्मान में हो रहे पाप से पीछे हटाता है और भविष्य में होने वाले पापो की वृत्ति को, पापो के संस्कार को खत्म कर देता है । 
  • जैसे जैसे लाभ बढ़ता है, वैसे वैसे हमारा लोभ भी बढ़ता जाता है । लोभ की आग हमारे सारे पुण्य को, मानवभाव के समय और शक्ति को ख़त्म कर देता है । 
  • जहाँ सूर्य का प्रकाश है वहाँ रात्रि का अंधेरा नहीं है । जहां अँधेरा है वहाँ सूर्य का प्रकाश नहीं है । जहां आनंद है वहाँ लोभ नहीं है और जहां लोभ है वहा आनंद, सुख और शान्ति नहीं है । जो लोभ ग्रस्त है वो कभी आनंद नहीं पा सकता । 
  • जैन धर्म कि आस्तिकता याने भगवान ने जहाँ-जहाँ पाप कहाँ, वहा-वहा पाप मानना । रात को भले खाना पड़े लेकिन मन में यही होना चाहिए कि मै पाप कर रहा हूँ । 
  • जैन धर्म कि अनुकम्पा याने (१) without partiality (२) without condition (३) without expectation दूसरे के दुःख देखकर मन द्रवित होना, दुखी होना । चाहे वो मेरा दुश्मन,विरोधी, competitor क्यों न हो, लेकिन वो दुखी है तो मै उसका दुःख दूर करने सहायक बनू । 
  • परिग्रह संज्ञा - लोभ कषाय के दृष्टांत में मम्मण सेठ maximum है तो हम भी minimum तो है न ? लोभ करने में हम भी कुछ कम नहीं । हम भी जल्दी से कुछ छोड़ नहीं सकते है, कोई भी attractive offer आती है तो हम पूजा, सामायिक, प्रवचनादि सब छोड़कर भी वो offer स्वीकार कर लेते है । 
  • लोभ कषाय को जीतने के लिए "नमो सिद्धाणं" का जाप करो । जो सिद्ध भगवंतो को शरीर भी नहीं है, कर्म भी नहीं है, जो सभी परिग्रह से मुक्त है, जो सभी इच्छा-लोभ अपेक्षा से मुक्त है - ऐसे सिद्ध भगवंत हमारे लोभ कषाय को खत्म करे । 

    चेन्नै उपधान प्रवचन - १४/१२/२०१३


     श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:
    • अरिहन्तादि पञ्च परमेष्ठि सम्बन्धी - उनका नाम स्मरण, प्रतिमा पूजन, ध्यान इत्यादि कुछ भी याद करने से मोहनिय कर्म का क्षयोपक्षम होता है । संसार सम्बन्धी जोई भी चीज़ याद करने से मोहनिय कर्म का उदय होता है । 
    • संपत्ति  को याद करने से लोभ पैदा होता है । सम्बन्धो और स्वजनो को याद करने से स्वार्थ और क्रोध भाव पैदा होता है । संसार याने मोहनिय कर्म की लागनी - feeling का बहता बड़ा प्रभाव । 
    • रेलवे की पटरी ट्रैन को चलाती नहीं फिर भी ट्रैन को चलने में मदद करती है, वैसे प्रभु हमारे कर्मो का नाश नहीं करते है लेकिन कर्मो को नाश करने के हमारे पुरुषार्थ में उनका नाम-जाप-ध्यान सहायक बनते है । 
    • सभी पापो का बाप लोभ है, क्रोधादि में सबसे  भयंकर लोभ है । जैन होते हुए भी आदमी बूचड़खाना चलाता है, हिंसात्मक व्यापार करता है । दूसरों के साथ माया,दम्भ,कपट करता है, भाई के साथ भी संघर्ष अन्याय करता है । लोभ सर्व विनाशक है । लोभ से जीव का पुण्य,शक्ति,सभ ख़त्म हो गए । अनंतकाल के बाद मिला मानवभाव एक लोभ के कारण पापो में ख़त्म हो गया । 
    • संसारी के पेट में गया हुआ भोजन पाप में जायेंगा । साधू के पात्र में  गया हुआ भोजन साधना में जायेंगा ।
    • आपके आजुबाजु में रहनेवाले आपके स्वजन, मित्र, पडोसी, हितस्वी वर्ग को पहचान लो - वो आपके वर्त्तमान को सुधारने के नाम पर, आपके पुण्य को खत्म नहीं करते है ना ? आपके भविष्य को नहीं बिगाड़ रहे है ना ? ऐसे हितस्वी से सावधान रहना । 
    • लोभ अग्नि जैसा है - उसमे कितना भी ईंधन डालो, उसे तृप्ति ही होती नहीं । बल्कि वो ज्यादा जलता है, वैसे लोभग्रस्त लोभी को कितना भी रूपया मिले उसे तृप्ति होती ही नहीं है । बल्कि उसका लोभ दिनबदिन बढ़ता ही जाता है ।  

    चेन्नै उपधान प्रवचन - १३/१२/२०१३


    श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:

    • जब तक अंतरात्मा जागृत नहीं हुई है, जब तक विवेकदृष्टि प्राप्त नहीं हुई है, तब तक आराधना मुश्किल है और पाप प्रवृत्ति आसान है । जितनी आसानी से Remote से t.v. चालू होता है, उतनी आसानी से चरवला लेकर सामायिक करते नहीं ।  
    •   भगवान कहते है - मानव भव की प्रत्येक पल आराधना में ही जानी चाहिए । विराधना में नहीं । हम विपरीत कर रहे है कि - हमारी प्रत्येक पल विराधना से भरी है और कुछ ही क्षण आराधना में जा रही है । 
    • मानव भव का प्रत्येक पल कोहिनूर के समान है । इसलिए शास्त्रकार कहते है - एक क्षण का भी प्रमाद मत करो । एक क्षण का प्रमाद हमारी जिंदगी भर कि आराधना-साधना को निष्फल बना सकता  है  । 
    • एक बार दानादि सुकृत किया, धर्म क्रिया की, उसे जितनी बार याद करो, अनुमोदना करो, उतनी बार फल मिलता है । और एक बार पाप किया, उसे जितनी बार याद किया, उसका अभिमान किया - प्रशंशा की, उतनी बार वो पाप का दंड बढ़ता जाता है ।
    • दिया हुआ दान निष्फल नहीं जाता और पाया हुआ ज्ञान निष्फल नहीं जाता । 
    • बिना विवेक किया हुआ व्रत-नियम-पच्चक्खाण पूर्ण फल देता नहीं है । 
    • खाने का ज्यादा शौख रखनेवाला अभक्ष्य भी खाता है और ज्यादा बोलनेवाला झूठ, परनिंदा, आत्मप्रशंसा का भी बोल देता है । 
    • सब एक दूसरे के पास अधिकार कि अपेक्षा रखे तो आग लगेगी, दुखी बनेंगे । सब अपनी-अपनी फर्ज निभाने लगे तो जीवन बाग़ बन जायेगा, खुशियो से भर जायेगा । 
    • दुनियादारी की दृष्टी से, शैतान की दृष्टी से जगत को देखना, वो मिथ्यादर्शन है । प्रभुने जो दृष्टी से जगत को देखा, वो दृष्टी से जगत को देखना, वो सम्यग्दर्शन है । 


    चेन्नै उपधान प्रवचन - १२/१२/२०१३

    श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:

    • "नमो अरिहंताणं" - नमस्कार शब्द ही अहंकार-नाशक है और विनय धर्म का प्रतीक है । 
    • आप अहंकार के कारण किसी को झुकने तैयार नहीं हो, अपनी गलत मान्यता और धरना छोड़ने तैयार नहीं हो और किसी भी बात में समाधान करने की वृत्तिवाले नहीं हो तो साक्षात् अरिहंत मिलने के बाद भी कोई फायदा नहीं है । 
    • "नमो" शब्द अरिहन्तादि पांच परमेष्ठि के साथ अपनी आत्मा को जोड़ने वाला bridge है । 
    • क्रोध करने बाद हमें कभी क्रोध करने का पछतावा हुआ नहीं है । क्रोध का पछतावा हुआ तो भी ये बात  हुआ कि: (१)जितनी गर्मी-ताकत से क्रोध करना उतनी गर्मी से न हुआ (२) क्रोध करने से आया हुआ ग्राहक चला गया । (३) जो सम्बन्ध-नाता बनाने सालो बीत गए, क्रोध करने से वो नाता टूट गया । (४) क्रोध करने से मेरी इज्जत/prestige  चली गई । ये पछतावा हुआ लेकिन क्रोध करने बाद कभी ये पछतावा नहीं हुआ कि - क्रोध से मेरी आत्मा दुर्गति गामी बनी, कर्मो से भारी बनी, मेरी शांत-शुद्ध चेतना अशुद्ध और असंकलिष्ट बनी । 
    • क्रोध इतना भयंकर नहीं है, जितना क्रोध सम्बन्धी दुर्बुद्धि । क्रोध सम्बन्धी दुर्बुद्धि याने (१) क्रोध करने से पूर्व क्रोध करने जैसा लगना (२) क्रोध करते वक्त क्रोध जरुरी लगना  (३) क्रोध करने के बाद उसका पछतावा न होना
    • "नमो अरिहंताणं" पद के जाप की Real Value क्या? मेरी दुर्बुद्धि का नाश हो । जो दुर्बुद्धि (१) हमें हमारे मोक्ष से, अनंत आनंद से दूर भेज रही है (२) हमारे भाई, पिता, पुत्र, पत्नी, मित्र आदि के साथ स्वार्थ बुद्धि उत्पन्न करवाती है (३) क्रोधादि करने जैसे है ऐसी मान्यता खड़ी करती है (४) टी.वी. देखने में क्या पाप है ? इत्यादि रूपसे पाप में पापबुद्धि का नाश करती है । मनमे उठनेवाली ऐसी दुर्बुद्धि का नाश होना ही अरिहंत नमस्कार की  Real Value  है । 
    • वो ही मंत्र जाप सिद्ध होता है, जो (१) गुरु मुख से मिले (२) सभी जीवो के साथ मैत्री भाव हो (३) मन-वचन-काय से पवित्र योग हो (४) जाप करते वक्त एकाग्रता और अखंडता हो । 

    चेन्नै उपधान प्रवचन - ११/१२/२०१३

     
    श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:

    • जैसे generator electricity उत्पन्न करती है वैसे दुरभुद्धि क्रोध-मान-माया-लोभ-कषायो को उत्पन्न  करती है । 
    • अनादि काल के संस्कार से क्रोधादि कषाय करने नहीं पड़ते - हो जाते है । और दुर्बुद्धि के प्रभाव से वो क्रोधादि करने जैसे लगते है - दुनिया में रहना है तो क्रोध करना ही पड़ेगा, तो ही लोग चुप रहेंगे,  सफलता मिली तो अभिमान तो होना ही चाहिए, व्यापार में सफल होने झूठ, चोरी, प्रपंच करना तो policy है और लोभ-असंतोष रखेंगे तो ही प्रगति कर पाएंगे । ऐसी-ऐसी गलत धारणाये भी दुर्बुद्धि के प्रभाव से करने जैसी लगती है । 
    •  भगवान कहते है - जहां आत्महित है वैसी धर्म साधना में संतोष रखो । और जहाँ पाप और संकलेश है ऐसी दुन्यवी धन-साधन में संतोष रखो । 
    • गांधीजी ने कहाँ कि - अंग्रेज भले रहे, लेकिन अंग्रेज संस्कृति नहीं रहनी चाहिए । वैसे हम कहते है - क्रोधादि भले रहे लेकिन उसकी दुर्बुद्धि नहीं रहनी चाहिए कि क्रोधादि करने जैसे है । ये क्रोधादि कषायो के प्रति  प्रेम, बचाव, पक्षपात, आनंद और अहंकार न रहना चाहिए । 
    • क्रोधादि कषाय करने मात्र से सफल नहीं होते, पुण्य होगा तो ही क्रोधादि कषाय सफल बनेंगे , अन्यथा अपने किये क्रोध पर लोग हसेंगे । 
    • दुनिया के क्षेत्र में बुद्धि चाहिए, तो ही सफलता मिलेंगी । वैसे धर्म क्षेत्र में श्रद्धा होगी तो ही सफलता मिलेंगी । हमनें गड़बड़ करदी - दुनिया के क्षेत्र में हम श्रद्धा रखकर पाप कार्य में जुड़ जाते है और धर्मं क्षेत्र में बुद्धि को आगेकर, हर बात में शंका करते है । 
    • जो चीज़ मेरे पेट-शारीर को बिगाड़ती है वो चीज़ सामनेवाला कितनी भी आग्रह करे, तो भी लेनी नहीं चाहिए । शरीर से भी महान मन है । जिससे मेरा मन बिगड़े, ऐसी किसी भी आकर्षक चीज़ सामने आये उसमे आसक्त न होना ।     

    चेन्नै उपधान प्रवचन - १०/१२/२०१३

      श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:

    •  दुनिया को जीतने वाला सफल कहा जाता है । लेकिन दोषो को जीतने वाला महान कहा जाता है । 
    • अरिहंत प्रभु को दुनिया भर की सभी प्रकार की विद्या सहज सिद्ध होती है । दुनिया में सभी विद्याओ से समर्थ विद्या - प्रयत्न के प्राप्त करने योग्य विद्या एक ही है - वह है वैराग्य विद्या । 
    • वीतरागता नाम कि विद्या सिद्ध करने से केवलज्ञान रूपी फल सहज ही प्राप्त होता है । 
    • आत्मा का प्रकाश पाने के लिए, दुन्यायी सम्बन्ध और साधनो में आसक्ति से बचने के लिए, आत्मा विद्या सिद्ध करने के लिए ही साधक बनना है, दुनिया में  प्रशंशा, वाह-वाह पाने के लिए साधक नहीं बनना । 
    • दुनिया में अभय, अखेद और अद्वेष की प्राप्ति वैरागी को ही होती है । 
    •  वैरागी को दुनिया के  कोई भी घटना-प्रसंग  ख़ुशी भी नहीं कर सकता तो दुखी भी नहीं कर सकता । 
    • पांच इन्द्रियो के विषयो का ऐसा चक्कर है कि, उसमे गिरने के बाद हमारी बाहर आने की ताकत नहीं है । जब तक टी.वी., मोबाइल, ए.सी. का उपभोग नहीं  किया था, तब तक प्रॉब्लम नहीं था, लेकिन एक बार टी.वी., मोबाइल, ए.सी. का उपभोग किया तो आज वो साधन के बिना एक सेकंड भी हमें नहीं चलता है । 
    • सोने की वीटी मिलती है तो हैम कीचड़ में भी हाथ डालने तैयार है, तो किसी से हमें ज्ञान मिलता है तो वह देनेवाला कौन है वो छोड़कर, विनयपूर्वक उसके पास से ज्ञान प्राप्त करना चाहिए । 
    • गुरु को समर्पित बने बिना दुनिया में वाह-वाह मिल सकती है, आत्मा कल्याण नहीं हो सकता है । 

    चेन्नै उपधान प्रवचन - २८/११/२०१३

      श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:
    •  हमारा मन, नीयम और पच्चक्खान के बंधन में आने को तैयार नहीं है । हमारा मन आराधना करने की कोई जवाबदारी उठाना चाहता नहीं है । 
    •  जिसे अपनी आत्मा को मुक्त करना है, उसे अपने मन को बंधन में लेना ही पड़ेगा । जिस का मन मुक्त घूम रहा है, उसकी आत्मा बंधन में रहेगी । 
    • जब तक हम नीयम-पच्चक्खान-बाधा नहीं लेते है तब तक हमें without discount dividend मिलता रहता है यानि बिना प्रवृति दुनिया भर के सरे पापो में भागीदारी का दंड मिलता रहता है । 
    • श्रावक के १२ प्रकार के व्रत - १२ प्रकार के पाप से रुक जाना । मुझे दुनिया भर के सभी प्रकार कि हिंसा में भागीदार बनना नहीं है । वैसे ही दुनिया में सभी प्रकार के झूठ, चोरी, कामाचार, दुराचार, भ्रष्टाचार में भागीदार बनना नहीं है । जिस जिसका पच्चक्खान न लिया, उस उस पाप का दंड मिलेगा । 
    • नए कर्मो का बंध करने चार चीज़ चाहिए - कर्म, शरीर, इन्द्रिय और मन । सिद्ध भगवंतो को ये चार चीज़ नहीं है । इसलिए हमें भी सर्व संवर, सर्व विरति, विशुद्धि और कर्म बंध से मुक्त होने 'नमो सिद्धाणं' पद का जाप करना है । 
    • प्रमाद याने आराधना के तत्वो में से मन का खिचक जाना । 
    • जीवनदान मिले तो संसार के बाकी कार्य पुरे करने है या संसार को छोड़कर आत्मा के कार्य करने है ?

    चेन्नै उपधान प्रवचन - २७/११/२०१३

      श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:
    • जिसने दुसरो को पूर्व  भव में दान दिया हैं, समय पर दिया है और प्रेम से दिया हैं उसे ही ये भव में भोग-उपभोग कि सामग्री मिलती है, समय पर मिलती है और प्रेम से मिलती है । 
    • पूर्व जन्म में हमने बहाने निकालकर धर्म आराधना की नहीं, धर्म किया तो भी उल्लास से न किया, दुसरो को आराधना में विघ्न अन्तराय किया, ये कारण से हमें ये जन्म में धर्म-आराधना में बहुत विघ्न अन्तराय आते हैं । कहीं शरीर बीमार होता है, कहीं घरवाले स्वजन न कहते है, कहीं हमरा मन ही कमजोर बन जाता है । 
    • दुनिया में सर्वश्रेस्ठ लाभ मोक्ष का ही है, ये ही पर्मानेंट लाभ है, बाकी दुनिया कि सभी लाभ टेम्पररी है । अच्छा बंगला  रहने मिला लेकिन ये भी टेम्पररी है,  या बंगला नष्ट होगा या बंगले में रहनेवाले चले जायेंगे । 
    •  जो पुण्यशाली  है, उसे द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव सब अनुकूल बन जाता है । जो पुन्यहीन है, उसे द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव सब प्रतिकूल बन जाता है । और पुण्य कि प्राप्ति धर्म-आराधना से ही होती है । 
    • अपनी वंश-परंपरा को आगे बदाना है तो - 
      1. कभी कार आदि वाहन  बसाना नहीं 
      2. बसाओ तो उसमे लम्भी मुसाफिरी करना नहीं 
      3. एक ही कार में पुरे परिवार को मुसाफिरी करना नहीं 

    चेन्नै उपधान प्रवचन - २६/११/२०१३

     श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:

    •  मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग ये पांच कारणो से जीव को प्रत्येक समय कर्म बंध हो रहा है । उसमें भी मिथ्यात्व कि हाजरी में भयंकर क्रूर लेश्या आ जाती हैं, जो जीव को नरकादि दुखो में ले जाता है । जो निकाचित पाप अवश्य भुगतना ही पड़ता है । 
    •  हमारे अनंत भविष्यकाल को तहेश-नहेश करनेवाला मिथ्यात्व का centrepoint - अहंकार है । अहंकार याने - भगवन के शाशन में बहुत सारी बात कही हुई है लेकिन मैं मेरी बुद्धि में बैठेगी वोही बात करूँगा । 
    • श्रद्धा और समर्पण भाव कि प्राप्ति के बिना अहंकार का त्याग नहीं हो सकता । 
    • सत्ता और संपत्ति के लालच में ही भारत पर बार बार आक्रमण हुआ है और आज भी सत्ता, संपत्ति के लिए आदमी अपनी वफ़ादारी बेच रहा है । पूरा भारत मात्र स्वार्थ के गणित पर चल रहा है कि - इससे मुझे आर्थिक लाभ क्या होगा ? 
    • कर्म कि थप्पड़ इतनी भारी है कि - हमारा पुण्य कब खत्म होगा हम जानते नहीं है । और पुण्य खत्म होने बाद समर्थ राजा को भी भीख मांगनी पड़ती है, इसलिए जब तक पांच इन्द्रिय सही सलामत है, शरीर का स्वास्थ्य अच्छा है, बुढ़ापा आया नहीं है, पुण्य टिका हुआ है तब तक धर्म, आराधना, सुकृत कर लो । 
    • दुश्मन कितना भी वफादार बने तो भी उस पर विश्वास करना नहीं, वैसे ही हमारे पांच इन्द्रिय और मन पर कभी विश्वास करना नहीं, आज जितनी आराधना कर सके कर लो, कल वो दगा भी दे सकता हैं ।    

    चेन्नै उपधान प्रवचन - २५/११/२०१३

     श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:

    • अरिहन्तादि पांच परमेष्ठि को वंदन करने के पीछे चार आशय है - 
      1. वह सर्वगुण संपन्न है 
      2. मै वो गुणो से रहित हूँ । 
      3. मुझे वो क्षमादि गुण प्राप्त करने कि इच्छा है और 
      4. ये पांच परमेष्ठी के प्रभाव से  मुझे ये क्षमादि गुणो कि प्राप्ति हुई है । 
    • जो हमारी वर्तमान जिंदगी को, शान्ति को, समाधि को और सद्गति को विष जहर बनाता है उसे  विषय कहते है । पांच इन्द्रिय के अनुकूल एवं आकर्षक विषय जीव के अनंत भविष्यकाल बिगड़ देता है । 
    • अनंत जीवो के बीच एक ही शरीर - उसे निगोद कहते है । अनंत जीवो के बीच एक भी शरीर नहीं - उसे निर्वाण कहते है । जिसने अपने शरीर का मोह पकड़कर रखा है वो निगोद में जाता है । जिसने अपने शरीर का मोह छोड़ दिया है वो निर्वाण में जाता हैं । 
    • Overconfidence - अतिआत्मविश्वास मारनेवाली चीज़ है । 
    • प्रेम से दुसरो को control करे तो वह हमारे अनुयायी बनते है । ताकत से दुसरो पर control करे तो वो हमारे दुश्मन बनते है । 
    • हमारा मन हमारा  दोस्त नहीं हमारा दुश्मन है, क्योंकि ये मन मोहनीय कर्म का मित्र, जासूस और गुप्तचर है । दुश्मन के मित्र को खुश करने में मजा नहीं आता है । ये मन को खुश करने से ही अनंतकाल से हम दौड़ रहे है । 
    • यदि हमारे पेट में दूधपाक हजम न हो , तो दूधपाक खाना ही नहीं । यदि हमारे मन में किसी की गुप्तबाते हजम न हो तो, तो गुप्तबात जानना ही नहीं ।  


      चेन्नै उपधान प्रवचन - २२/११/२०१३


      श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने सम्बोधित करते हुए कहा कि:
      • नमस्कार महामंत्र इतना प्रभावशाली है कि - जिसके ध्यान से हमारे ज्ञानावर्णादि आठो कर्मो का नाश होता है; सौभाग्य, यश, कीर्ति आदि शुभकर्मो का उदय होता है ; असंख्य भव तक कष्ट और पीड़ा  देने वाले अशुभ कर्मो से मुक्ति मिलती है । अनंतकाल के बाद मिले हुए इस महामंत्र का हम श्रद्धा से जाप करे तो अनंतकाल से हमें दुखदेने वाले विषय वासना कषायो रूपी बीमारियो से मुक्ति देनेवाली महान औषधि बन सकती है ।  
      •  अनादिकाल से हमें कान के विषयो का आकर्षण है । उसमे भी संगीत-गीत-आत्मा प्रशंशा और परनिंदा सुनना  उत्तरोत्तर पसंद है । और दुष्ट जीवो को तो दुसरो कि पीडाओ की चीख सुनकर भी आनंद आता है । ये ही विषयाकर्षण हमें भविष्य में अनंतकाल तक कान न मिले उसके लिए समर्थ है । कर्म सत्ता का कानून है कि - आपको जो सामग्री दी उसका आप सदुपयोग न करो और दुरूपयोग करो तो वह सामग्री आपको अनंतकाल तक न देगी । 
      • हम अनंतकाल कि उम्र वाले बच्चे है । क्योंकि हमें आजतक पता नहीं चला कि - क्या पकड़ने जैसा है, क्या छोड़ने जैसा है । हमें जो आत्मा के लिए अहितकर है वो पकड़ लेते है और जो हितकर है वो छोड़ देते है । 
      • कान के विषयो को जीतने के लिए कान पर हाथ रखकर "नमो अरिहंताणं" पद का जाप करो, संकल्प पूर्वक जाप करो कि मेरे कान प्रभु के गीत-संगीत में देव-गुरु-संघ कि प्रशंशा में और आत्मा कि निंदा सुनने में ही एकाग्र बने ।  

      चेन्नै उपधान प्रवचन - २१/११/२०१३

      श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने सम्बोधित करते हुए कहा कि:

      • शनि गृह आये तो किसी को पसंद नहीं है -  वैसे क्रोधी आदमी आये तो किसी को पसंद नहीं आता है । दुनिया में सबसे बड़ी पनौती - problem क्रोध है । क्रोध वर्तमान जिंदगी को बिगाड़ता ही है, हमारे अगले जनम को भी बिगाड़ता है । 
      • बिना प्रयोजन दुनिया में कार्य करने वाला तीन ही व्यक्ति है - बालक, मुर्ख, पागल । अगर आप भी जो प्रवृत्ति कर रहो हो और उसको प्रयोजन पता नहीं तो तय कर लेना आप का नंबर किस में आता है ? नवकार माला क्यों गिनना? पूजा क्यों करना ? सामयिक क्यों करना ? हर प्रवृत्ति प्रयोजन पूर्वक करो । 
      • अनादिकाल से हमारी आत्मा के ऊपर क्रोध आदि दोषो के layer जम गए है । वो दोषो को जितने के लिए सख्त, सतत और दृढ़ पुरुषार्थ करना पड़ेगा । उसके लिए रोज संकल्प करो कि आज कि धर्म क्रिया में क्रोधकषाय जितने को कर रहा हूँ । इत्यादि प्रयोजन रखा तो भविष्य में अवश्य हम ये दोषो पर विजय प्राप्त कर सकेगे । 
      • विनियोग याने जो मुझे प्राप्त हुआ है मेरे संपर्क में  आने  वाले सभी जीवो को भी प्राप्त होन चाहिए । 
      •  आदमी किसी को वफादार नहीं है लेकिन वो अपेक्षा रखता है कि - सब मुझे वफादार रहे । 
      • जिसे कुछ करना नहीं है , या कुछ कर नहीं सकता उसकी ईर्ष्या निंदा दुर्भावना दूसरे के बिगड़ने में ही convert हो जाती हैं ।  


      चेन्नै उपधान प्रवचन - २०/११/२०१३


      प्रवचन प्रभावक  पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने सम्बोधित करते हुए कहा कि:

      • सिद्ध  भगवंतो को धन्य है कि - जिनको शारीर ही नहीं है । इसी कारण वे किसी भी जीव के कष्ट, पीड़ा, वेदना, दुःख में निमित ही बनते नहीं हैं ।
      • जिसे साधू बनने कि इच्छा हो और १२ व्रत के  पालन में जो उत्साही हो वोही सच्चा श्रावक हैं । 
      • हमें पाप कार्य करने में कोई विघ्न , अन्तराय आते नहीं हैं लेकिन धर्म कार्य करने में विघ्न, अन्तराय आते है । होटल, थिएटर, प्रवास, पिकनिक में कोई विघ्न नहीं आतें लेकिन उपवास, तीर्थ यात्रा, सामायिक, प्रतिक्रमण करना हो तो विघ्न आ जाते हैं । उसके दो कारण है:-
        1. पूर्व भव में हमने दुसरो को  आराधना में सहायक बनने कि जगह उनको विघ्न रूप अन्तराय रूप बने । 
        2. पूर्व भव में हमने जो धर्म आराधना कि  वो आनंद और उत्साह से करने कि जगह भार मानकर की । करनी पड़ रही है  ऐसे मानकर जबर्दस्ती कि । 
      • भविष्य के लिए planning करना हमारे हाथ में है लेकिन वो planning सफल होना हमारे हाथ में नहीं । वह तो कर्म-भवितव्यता-पुण्य-भाग्य के हाथ में है । 
      • दुनिया में दो प्रकार के पुण्य है:-
        1. स्वदेश पुण्य - जिसको अपने राज्य में ही समृद्धि बड़े, कमाई बड़े 
        2. परदेश पुण्य - जिसको परदेश में जाने के बाद ही समृद्धि बड़े 
      • दुनिया का ये विचित्र नियम हैं कि - एक महनत करे दूसरा मजा करे ।    

      चेन्नै उपधान प्रवचन - १९/११/२०१३

      प्रवचन प्रभावक  पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने सम्बोधित करते हुए कहा कि:

      • अनंतकाल से हम सुख ढूंढने के लिए दौड़ते रहे लेकिन जहा जहा सुख ढुंढने निकले वहा वहा हमें दुःख ही मिला । सुख  समस्या बनी और दुःख उसका परिणाम बना । अरिहंत प्रभु का सबसे बड़ा उपकार यह है कि - अनंतकाल से दुःख में दुबे हमें अनंतकाल सुख मिले ऐसा मार्ग दिखलाया । 
      • जो कार्य का अभ्यास किया जाये, वह कार्य में हम perfect बनेंगे । जो कार्य त्रास कंटाळा के साथ किया जाये वह कार्य का कुछ फल  मिलता नहीं है । हमें धर्म के प्रत्येक कार्य - क्रिया रस के साथ  अभ्यास के साथ करनी है, जिससे वह धर्म क्रिया के संस्कार, अगले भाव  में भी हमारे साथ आए । 
      • ९९ मीठी बादाम खाने के बाद एक कड़वी बादाम आयी, तो हमें ९९ मीठी बादाम याद नहीं रहती लेकिन एक कड़वी बादाम बार बार याद आती है । वैसे २० आदमी हमारी प्रशंसा करे वो हमें याद नहीं रहता लेकिन एक आदमी हमारा अपनमान करे तो वह बात हमें २५ साल के बाद भी याद रहती हैं । 
      • कष्ट किये बिना धन नहीं मिलता है, तो कष्ट किये बिना धर्म भी नहीं मिलता है । वर्त्तमान में सुखी होने धन चाहिए, तो भविष्य में  सुखी होने धर्म चाहिए । ऐसे धर्म को पाने के लिए कष्ट सहन करना ही पड़ेगा । 
      • किया हुआ एक भी शुभ कार्य कभी निष्फल नहीं जाता, अवश्य फल देता ही है । सिवाय कि आप वह कार्य का अफ़सोस ना करे । 

      चेन्नै उपधान प्रवचन - १८/११/२०१३


      आचार्य पू.आ. अजितशेखरसूरीश्वरजी मा. सा. ने संबोधन करते कहा कि:

      • अरिहंत भगवंत कहते है - मोक्ष मार्ग संमार्ग पर चलो । 
      • सिद्ध भगवंत कहते है - पुरुषार्थ करना है तो ऐसी चीज के लिए करो जो प्राप्त  होने बाद  कभी न जाय । 
      • आचार्य भगवंत कहते है - दुराचारो  को छोड़कर सदाचार का पालन करो । 
      • उपाध्याय भगवंत कहते है - उपकारी, वडिल, गुरु आदि का सतत विनय करो । 
      • सधु भगवंत कहते है - सभी को सहाय करो । 
      1. प्रयत्न कर कुछ  बहार प्राप्त करना वो सफलता है । कैसी भी स्थिति में अंदर आत्मा में रहना वो सिद्धि है ।
      2. पुण्य  से प्राप्त हो वो सफलता है, अपने पुरुषार्थ से प्राप्त हो वो सिद्धि है । 
      3. Temporary प्राप्त हो वो सफलता है । Permanent प्राप्त हो वो सिद्धि है । 
      4. आपके कार्य को देख वाह-वाह करे वो सफलता है,   आपके कार्य को देख लोगो को आपके प्रति आकर्षण हो वो सिद्धि है ।  
      अब तय करो कि आपको प्राप्त  घर,परिवार, संपति, सन्मान वो सफलता है या सिद्धि?