श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:
- "सव्व पावप्पणासणो" - पञ्च परमेष्ठि के जाप की ताकत है कि वो भूत काल में किये हुए पापो को नाश करता है, वर्त्मान में हो रहे पाप से पीछे हटाता है और भविष्य में होने वाले पापो की वृत्ति को, पापो के संस्कार को खत्म कर देता है ।
- जैसे जैसे लाभ बढ़ता है, वैसे वैसे हमारा लोभ भी बढ़ता जाता है । लोभ की आग हमारे सारे पुण्य को, मानवभाव के समय और शक्ति को ख़त्म कर देता है ।
- जहाँ सूर्य का प्रकाश है वहाँ रात्रि का अंधेरा नहीं है । जहां अँधेरा है वहाँ सूर्य का प्रकाश नहीं है । जहां आनंद है वहाँ लोभ नहीं है और जहां लोभ है वहा आनंद, सुख और शान्ति नहीं है । जो लोभ ग्रस्त है वो कभी आनंद नहीं पा सकता ।
- जैन धर्म कि आस्तिकता याने भगवान ने जहाँ-जहाँ पाप कहाँ, वहा-वहा पाप मानना । रात को भले खाना पड़े लेकिन मन में यही होना चाहिए कि मै पाप कर रहा हूँ ।
- जैन धर्म कि अनुकम्पा याने (१) without partiality (२) without condition (३) without expectation दूसरे के दुःख देखकर मन द्रवित होना, दुखी होना । चाहे वो मेरा दुश्मन,विरोधी, competitor क्यों न हो, लेकिन वो दुखी है तो मै उसका दुःख दूर करने सहायक बनू ।
- परिग्रह संज्ञा - लोभ कषाय के दृष्टांत में मम्मण सेठ maximum है तो हम भी minimum तो है न ? लोभ करने में हम भी कुछ कम नहीं । हम भी जल्दी से कुछ छोड़ नहीं सकते है, कोई भी attractive offer आती है तो हम पूजा, सामायिक, प्रवचनादि सब छोड़कर भी वो offer स्वीकार कर लेते है ।
- लोभ कषाय को जीतने के लिए "नमो सिद्धाणं" का जाप करो । जो सिद्ध भगवंतो को शरीर भी नहीं है, कर्म भी नहीं है, जो सभी परिग्रह से मुक्त है, जो सभी इच्छा-लोभ अपेक्षा से मुक्त है - ऐसे सिद्ध भगवंत हमारे लोभ कषाय को खत्म करे ।




