श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:
- हमारा मन, नीयम और पच्चक्खान के बंधन में आने को तैयार नहीं है । हमारा मन आराधना करने की कोई जवाबदारी उठाना चाहता नहीं है ।
- जिसे अपनी आत्मा को मुक्त करना है, उसे अपने मन को बंधन में लेना ही पड़ेगा । जिस का मन मुक्त घूम रहा है, उसकी आत्मा बंधन में रहेगी ।
- जब तक हम नीयम-पच्चक्खान-बाधा नहीं लेते है तब तक हमें without discount dividend मिलता रहता है यानि बिना प्रवृति दुनिया भर के सरे पापो में भागीदारी का दंड मिलता रहता है ।
- श्रावक के १२ प्रकार के व्रत - १२ प्रकार के पाप से रुक जाना । मुझे दुनिया भर के सभी प्रकार कि हिंसा में भागीदार बनना नहीं है । वैसे ही दुनिया में सभी प्रकार के झूठ, चोरी, कामाचार, दुराचार, भ्रष्टाचार में भागीदार बनना नहीं है । जिस जिसका पच्चक्खान न लिया, उस उस पाप का दंड मिलेगा ।
- नए कर्मो का बंध करने चार चीज़ चाहिए - कर्म, शरीर, इन्द्रिय और मन । सिद्ध भगवंतो को ये चार चीज़ नहीं है । इसलिए हमें भी सर्व संवर, सर्व विरति, विशुद्धि और कर्म बंध से मुक्त होने 'नमो सिद्धाणं' पद का जाप करना है ।
- प्रमाद याने आराधना के तत्वो में से मन का खिचक जाना ।
- जीवनदान मिले तो संसार के बाकी कार्य पुरे करने है या संसार को छोड़कर आत्मा के कार्य करने है ?