चेन्नै उपधान प्रवचन - २८/११/२०१३

  श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:
  •  हमारा मन, नीयम और पच्चक्खान के बंधन में आने को तैयार नहीं है । हमारा मन आराधना करने की कोई जवाबदारी उठाना चाहता नहीं है । 
  •  जिसे अपनी आत्मा को मुक्त करना है, उसे अपने मन को बंधन में लेना ही पड़ेगा । जिस का मन मुक्त घूम रहा है, उसकी आत्मा बंधन में रहेगी । 
  • जब तक हम नीयम-पच्चक्खान-बाधा नहीं लेते है तब तक हमें without discount dividend मिलता रहता है यानि बिना प्रवृति दुनिया भर के सरे पापो में भागीदारी का दंड मिलता रहता है । 
  • श्रावक के १२ प्रकार के व्रत - १२ प्रकार के पाप से रुक जाना । मुझे दुनिया भर के सभी प्रकार कि हिंसा में भागीदार बनना नहीं है । वैसे ही दुनिया में सभी प्रकार के झूठ, चोरी, कामाचार, दुराचार, भ्रष्टाचार में भागीदार बनना नहीं है । जिस जिसका पच्चक्खान न लिया, उस उस पाप का दंड मिलेगा । 
  • नए कर्मो का बंध करने चार चीज़ चाहिए - कर्म, शरीर, इन्द्रिय और मन । सिद्ध भगवंतो को ये चार चीज़ नहीं है । इसलिए हमें भी सर्व संवर, सर्व विरति, विशुद्धि और कर्म बंध से मुक्त होने 'नमो सिद्धाणं' पद का जाप करना है । 
  • प्रमाद याने आराधना के तत्वो में से मन का खिचक जाना । 
  • जीवनदान मिले तो संसार के बाकी कार्य पुरे करने है या संसार को छोड़कर आत्मा के कार्य करने है ?

चेन्नै उपधान प्रवचन - २७/११/२०१३

  श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:
  • जिसने दुसरो को पूर्व  भव में दान दिया हैं, समय पर दिया है और प्रेम से दिया हैं उसे ही ये भव में भोग-उपभोग कि सामग्री मिलती है, समय पर मिलती है और प्रेम से मिलती है । 
  • पूर्व जन्म में हमने बहाने निकालकर धर्म आराधना की नहीं, धर्म किया तो भी उल्लास से न किया, दुसरो को आराधना में विघ्न अन्तराय किया, ये कारण से हमें ये जन्म में धर्म-आराधना में बहुत विघ्न अन्तराय आते हैं । कहीं शरीर बीमार होता है, कहीं घरवाले स्वजन न कहते है, कहीं हमरा मन ही कमजोर बन जाता है । 
  • दुनिया में सर्वश्रेस्ठ लाभ मोक्ष का ही है, ये ही पर्मानेंट लाभ है, बाकी दुनिया कि सभी लाभ टेम्पररी है । अच्छा बंगला  रहने मिला लेकिन ये भी टेम्पररी है,  या बंगला नष्ट होगा या बंगले में रहनेवाले चले जायेंगे । 
  •  जो पुण्यशाली  है, उसे द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव सब अनुकूल बन जाता है । जो पुन्यहीन है, उसे द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव सब प्रतिकूल बन जाता है । और पुण्य कि प्राप्ति धर्म-आराधना से ही होती है । 
  • अपनी वंश-परंपरा को आगे बदाना है तो - 
    1. कभी कार आदि वाहन  बसाना नहीं 
    2. बसाओ तो उसमे लम्भी मुसाफिरी करना नहीं 
    3. एक ही कार में पुरे परिवार को मुसाफिरी करना नहीं 

चेन्नै उपधान प्रवचन - २६/११/२०१३

 श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:

  •  मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग ये पांच कारणो से जीव को प्रत्येक समय कर्म बंध हो रहा है । उसमें भी मिथ्यात्व कि हाजरी में भयंकर क्रूर लेश्या आ जाती हैं, जो जीव को नरकादि दुखो में ले जाता है । जो निकाचित पाप अवश्य भुगतना ही पड़ता है । 
  •  हमारे अनंत भविष्यकाल को तहेश-नहेश करनेवाला मिथ्यात्व का centrepoint - अहंकार है । अहंकार याने - भगवन के शाशन में बहुत सारी बात कही हुई है लेकिन मैं मेरी बुद्धि में बैठेगी वोही बात करूँगा । 
  • श्रद्धा और समर्पण भाव कि प्राप्ति के बिना अहंकार का त्याग नहीं हो सकता । 
  • सत्ता और संपत्ति के लालच में ही भारत पर बार बार आक्रमण हुआ है और आज भी सत्ता, संपत्ति के लिए आदमी अपनी वफ़ादारी बेच रहा है । पूरा भारत मात्र स्वार्थ के गणित पर चल रहा है कि - इससे मुझे आर्थिक लाभ क्या होगा ? 
  • कर्म कि थप्पड़ इतनी भारी है कि - हमारा पुण्य कब खत्म होगा हम जानते नहीं है । और पुण्य खत्म होने बाद समर्थ राजा को भी भीख मांगनी पड़ती है, इसलिए जब तक पांच इन्द्रिय सही सलामत है, शरीर का स्वास्थ्य अच्छा है, बुढ़ापा आया नहीं है, पुण्य टिका हुआ है तब तक धर्म, आराधना, सुकृत कर लो । 
  • दुश्मन कितना भी वफादार बने तो भी उस पर विश्वास करना नहीं, वैसे ही हमारे पांच इन्द्रिय और मन पर कभी विश्वास करना नहीं, आज जितनी आराधना कर सके कर लो, कल वो दगा भी दे सकता हैं ।    

चेन्नै उपधान प्रवचन - २५/११/२०१३

 श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:

  • अरिहन्तादि पांच परमेष्ठि को वंदन करने के पीछे चार आशय है - 
    1. वह सर्वगुण संपन्न है 
    2. मै वो गुणो से रहित हूँ । 
    3. मुझे वो क्षमादि गुण प्राप्त करने कि इच्छा है और 
    4. ये पांच परमेष्ठी के प्रभाव से  मुझे ये क्षमादि गुणो कि प्राप्ति हुई है । 
  • जो हमारी वर्तमान जिंदगी को, शान्ति को, समाधि को और सद्गति को विष जहर बनाता है उसे  विषय कहते है । पांच इन्द्रिय के अनुकूल एवं आकर्षक विषय जीव के अनंत भविष्यकाल बिगड़ देता है । 
  • अनंत जीवो के बीच एक ही शरीर - उसे निगोद कहते है । अनंत जीवो के बीच एक भी शरीर नहीं - उसे निर्वाण कहते है । जिसने अपने शरीर का मोह पकड़कर रखा है वो निगोद में जाता है । जिसने अपने शरीर का मोह छोड़ दिया है वो निर्वाण में जाता हैं । 
  • Overconfidence - अतिआत्मविश्वास मारनेवाली चीज़ है । 
  • प्रेम से दुसरो को control करे तो वह हमारे अनुयायी बनते है । ताकत से दुसरो पर control करे तो वो हमारे दुश्मन बनते है । 
  • हमारा मन हमारा  दोस्त नहीं हमारा दुश्मन है, क्योंकि ये मन मोहनीय कर्म का मित्र, जासूस और गुप्तचर है । दुश्मन के मित्र को खुश करने में मजा नहीं आता है । ये मन को खुश करने से ही अनंतकाल से हम दौड़ रहे है । 
  • यदि हमारे पेट में दूधपाक हजम न हो , तो दूधपाक खाना ही नहीं । यदि हमारे मन में किसी की गुप्तबाते हजम न हो तो, तो गुप्तबात जानना ही नहीं ।  


    चेन्नै उपधान प्रवचन - २२/११/२०१३


    श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने सम्बोधित करते हुए कहा कि:
    • नमस्कार महामंत्र इतना प्रभावशाली है कि - जिसके ध्यान से हमारे ज्ञानावर्णादि आठो कर्मो का नाश होता है; सौभाग्य, यश, कीर्ति आदि शुभकर्मो का उदय होता है ; असंख्य भव तक कष्ट और पीड़ा  देने वाले अशुभ कर्मो से मुक्ति मिलती है । अनंतकाल के बाद मिले हुए इस महामंत्र का हम श्रद्धा से जाप करे तो अनंतकाल से हमें दुखदेने वाले विषय वासना कषायो रूपी बीमारियो से मुक्ति देनेवाली महान औषधि बन सकती है ।  
    •  अनादिकाल से हमें कान के विषयो का आकर्षण है । उसमे भी संगीत-गीत-आत्मा प्रशंशा और परनिंदा सुनना  उत्तरोत्तर पसंद है । और दुष्ट जीवो को तो दुसरो कि पीडाओ की चीख सुनकर भी आनंद आता है । ये ही विषयाकर्षण हमें भविष्य में अनंतकाल तक कान न मिले उसके लिए समर्थ है । कर्म सत्ता का कानून है कि - आपको जो सामग्री दी उसका आप सदुपयोग न करो और दुरूपयोग करो तो वह सामग्री आपको अनंतकाल तक न देगी । 
    • हम अनंतकाल कि उम्र वाले बच्चे है । क्योंकि हमें आजतक पता नहीं चला कि - क्या पकड़ने जैसा है, क्या छोड़ने जैसा है । हमें जो आत्मा के लिए अहितकर है वो पकड़ लेते है और जो हितकर है वो छोड़ देते है । 
    • कान के विषयो को जीतने के लिए कान पर हाथ रखकर "नमो अरिहंताणं" पद का जाप करो, संकल्प पूर्वक जाप करो कि मेरे कान प्रभु के गीत-संगीत में देव-गुरु-संघ कि प्रशंशा में और आत्मा कि निंदा सुनने में ही एकाग्र बने ।  

    चेन्नै उपधान प्रवचन - २१/११/२०१३

    श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने सम्बोधित करते हुए कहा कि:

    • शनि गृह आये तो किसी को पसंद नहीं है -  वैसे क्रोधी आदमी आये तो किसी को पसंद नहीं आता है । दुनिया में सबसे बड़ी पनौती - problem क्रोध है । क्रोध वर्तमान जिंदगी को बिगाड़ता ही है, हमारे अगले जनम को भी बिगाड़ता है । 
    • बिना प्रयोजन दुनिया में कार्य करने वाला तीन ही व्यक्ति है - बालक, मुर्ख, पागल । अगर आप भी जो प्रवृत्ति कर रहो हो और उसको प्रयोजन पता नहीं तो तय कर लेना आप का नंबर किस में आता है ? नवकार माला क्यों गिनना? पूजा क्यों करना ? सामयिक क्यों करना ? हर प्रवृत्ति प्रयोजन पूर्वक करो । 
    • अनादिकाल से हमारी आत्मा के ऊपर क्रोध आदि दोषो के layer जम गए है । वो दोषो को जितने के लिए सख्त, सतत और दृढ़ पुरुषार्थ करना पड़ेगा । उसके लिए रोज संकल्प करो कि आज कि धर्म क्रिया में क्रोधकषाय जितने को कर रहा हूँ । इत्यादि प्रयोजन रखा तो भविष्य में अवश्य हम ये दोषो पर विजय प्राप्त कर सकेगे । 
    • विनियोग याने जो मुझे प्राप्त हुआ है मेरे संपर्क में  आने  वाले सभी जीवो को भी प्राप्त होन चाहिए । 
    •  आदमी किसी को वफादार नहीं है लेकिन वो अपेक्षा रखता है कि - सब मुझे वफादार रहे । 
    • जिसे कुछ करना नहीं है , या कुछ कर नहीं सकता उसकी ईर्ष्या निंदा दुर्भावना दूसरे के बिगड़ने में ही convert हो जाती हैं ।  


    चेन्नै उपधान प्रवचन - २०/११/२०१३


    प्रवचन प्रभावक  पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने सम्बोधित करते हुए कहा कि:

    • सिद्ध  भगवंतो को धन्य है कि - जिनको शारीर ही नहीं है । इसी कारण वे किसी भी जीव के कष्ट, पीड़ा, वेदना, दुःख में निमित ही बनते नहीं हैं ।
    • जिसे साधू बनने कि इच्छा हो और १२ व्रत के  पालन में जो उत्साही हो वोही सच्चा श्रावक हैं । 
    • हमें पाप कार्य करने में कोई विघ्न , अन्तराय आते नहीं हैं लेकिन धर्म कार्य करने में विघ्न, अन्तराय आते है । होटल, थिएटर, प्रवास, पिकनिक में कोई विघ्न नहीं आतें लेकिन उपवास, तीर्थ यात्रा, सामायिक, प्रतिक्रमण करना हो तो विघ्न आ जाते हैं । उसके दो कारण है:-
      1. पूर्व भव में हमने दुसरो को  आराधना में सहायक बनने कि जगह उनको विघ्न रूप अन्तराय रूप बने । 
      2. पूर्व भव में हमने जो धर्म आराधना कि  वो आनंद और उत्साह से करने कि जगह भार मानकर की । करनी पड़ रही है  ऐसे मानकर जबर्दस्ती कि । 
    • भविष्य के लिए planning करना हमारे हाथ में है लेकिन वो planning सफल होना हमारे हाथ में नहीं । वह तो कर्म-भवितव्यता-पुण्य-भाग्य के हाथ में है । 
    • दुनिया में दो प्रकार के पुण्य है:-
      1. स्वदेश पुण्य - जिसको अपने राज्य में ही समृद्धि बड़े, कमाई बड़े 
      2. परदेश पुण्य - जिसको परदेश में जाने के बाद ही समृद्धि बड़े 
    • दुनिया का ये विचित्र नियम हैं कि - एक महनत करे दूसरा मजा करे ।    

    चेन्नै उपधान प्रवचन - १९/११/२०१३

    प्रवचन प्रभावक  पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने सम्बोधित करते हुए कहा कि:

    • अनंतकाल से हम सुख ढूंढने के लिए दौड़ते रहे लेकिन जहा जहा सुख ढुंढने निकले वहा वहा हमें दुःख ही मिला । सुख  समस्या बनी और दुःख उसका परिणाम बना । अरिहंत प्रभु का सबसे बड़ा उपकार यह है कि - अनंतकाल से दुःख में दुबे हमें अनंतकाल सुख मिले ऐसा मार्ग दिखलाया । 
    • जो कार्य का अभ्यास किया जाये, वह कार्य में हम perfect बनेंगे । जो कार्य त्रास कंटाळा के साथ किया जाये वह कार्य का कुछ फल  मिलता नहीं है । हमें धर्म के प्रत्येक कार्य - क्रिया रस के साथ  अभ्यास के साथ करनी है, जिससे वह धर्म क्रिया के संस्कार, अगले भाव  में भी हमारे साथ आए । 
    • ९९ मीठी बादाम खाने के बाद एक कड़वी बादाम आयी, तो हमें ९९ मीठी बादाम याद नहीं रहती लेकिन एक कड़वी बादाम बार बार याद आती है । वैसे २० आदमी हमारी प्रशंसा करे वो हमें याद नहीं रहता लेकिन एक आदमी हमारा अपनमान करे तो वह बात हमें २५ साल के बाद भी याद रहती हैं । 
    • कष्ट किये बिना धन नहीं मिलता है, तो कष्ट किये बिना धर्म भी नहीं मिलता है । वर्त्तमान में सुखी होने धन चाहिए, तो भविष्य में  सुखी होने धर्म चाहिए । ऐसे धर्म को पाने के लिए कष्ट सहन करना ही पड़ेगा । 
    • किया हुआ एक भी शुभ कार्य कभी निष्फल नहीं जाता, अवश्य फल देता ही है । सिवाय कि आप वह कार्य का अफ़सोस ना करे । 

    चेन्नै उपधान प्रवचन - १८/११/२०१३


    आचार्य पू.आ. अजितशेखरसूरीश्वरजी मा. सा. ने संबोधन करते कहा कि:

    • अरिहंत भगवंत कहते है - मोक्ष मार्ग संमार्ग पर चलो । 
    • सिद्ध भगवंत कहते है - पुरुषार्थ करना है तो ऐसी चीज के लिए करो जो प्राप्त  होने बाद  कभी न जाय । 
    • आचार्य भगवंत कहते है - दुराचारो  को छोड़कर सदाचार का पालन करो । 
    • उपाध्याय भगवंत कहते है - उपकारी, वडिल, गुरु आदि का सतत विनय करो । 
    • सधु भगवंत कहते है - सभी को सहाय करो । 
    1. प्रयत्न कर कुछ  बहार प्राप्त करना वो सफलता है । कैसी भी स्थिति में अंदर आत्मा में रहना वो सिद्धि है ।
    2. पुण्य  से प्राप्त हो वो सफलता है, अपने पुरुषार्थ से प्राप्त हो वो सिद्धि है । 
    3. Temporary प्राप्त हो वो सफलता है । Permanent प्राप्त हो वो सिद्धि है । 
    4. आपके कार्य को देख वाह-वाह करे वो सफलता है,   आपके कार्य को देख लोगो को आपके प्रति आकर्षण हो वो सिद्धि है ।  
    अब तय करो कि आपको प्राप्त  घर,परिवार, संपति, सन्मान वो सफलता है या सिद्धि?