चेन्नै उपधान प्रवचन - ११/१२/२०१३

 
श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:

  • जैसे generator electricity उत्पन्न करती है वैसे दुरभुद्धि क्रोध-मान-माया-लोभ-कषायो को उत्पन्न  करती है । 
  • अनादि काल के संस्कार से क्रोधादि कषाय करने नहीं पड़ते - हो जाते है । और दुर्बुद्धि के प्रभाव से वो क्रोधादि करने जैसे लगते है - दुनिया में रहना है तो क्रोध करना ही पड़ेगा, तो ही लोग चुप रहेंगे,  सफलता मिली तो अभिमान तो होना ही चाहिए, व्यापार में सफल होने झूठ, चोरी, प्रपंच करना तो policy है और लोभ-असंतोष रखेंगे तो ही प्रगति कर पाएंगे । ऐसी-ऐसी गलत धारणाये भी दुर्बुद्धि के प्रभाव से करने जैसी लगती है । 
  •  भगवान कहते है - जहां आत्महित है वैसी धर्म साधना में संतोष रखो । और जहाँ पाप और संकलेश है ऐसी दुन्यवी धन-साधन में संतोष रखो । 
  • गांधीजी ने कहाँ कि - अंग्रेज भले रहे, लेकिन अंग्रेज संस्कृति नहीं रहनी चाहिए । वैसे हम कहते है - क्रोधादि भले रहे लेकिन उसकी दुर्बुद्धि नहीं रहनी चाहिए कि क्रोधादि करने जैसे है । ये क्रोधादि कषायो के प्रति  प्रेम, बचाव, पक्षपात, आनंद और अहंकार न रहना चाहिए । 
  • क्रोधादि कषाय करने मात्र से सफल नहीं होते, पुण्य होगा तो ही क्रोधादि कषाय सफल बनेंगे , अन्यथा अपने किये क्रोध पर लोग हसेंगे । 
  • दुनिया के क्षेत्र में बुद्धि चाहिए, तो ही सफलता मिलेंगी । वैसे धर्म क्षेत्र में श्रद्धा होगी तो ही सफलता मिलेंगी । हमनें गड़बड़ करदी - दुनिया के क्षेत्र में हम श्रद्धा रखकर पाप कार्य में जुड़ जाते है और धर्मं क्षेत्र में बुद्धि को आगेकर, हर बात में शंका करते है । 
  • जो चीज़ मेरे पेट-शारीर को बिगाड़ती है वो चीज़ सामनेवाला कितनी भी आग्रह करे, तो भी लेनी नहीं चाहिए । शरीर से भी महान मन है । जिससे मेरा मन बिगड़े, ऐसी किसी भी आकर्षक चीज़ सामने आये उसमे आसक्त न होना ।     

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