श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:
- जब तक अंतरात्मा जागृत नहीं हुई है, जब तक विवेकदृष्टि प्राप्त नहीं हुई है, तब तक आराधना मुश्किल है और पाप प्रवृत्ति आसान है । जितनी आसानी से Remote से t.v. चालू होता है, उतनी आसानी से चरवला लेकर सामायिक करते नहीं ।
- भगवान कहते है - मानव भव की प्रत्येक पल आराधना में ही जानी चाहिए । विराधना में नहीं । हम विपरीत कर रहे है कि - हमारी प्रत्येक पल विराधना से भरी है और कुछ ही क्षण आराधना में जा रही है ।
- मानव भव का प्रत्येक पल कोहिनूर के समान है । इसलिए शास्त्रकार कहते है - एक क्षण का भी प्रमाद मत करो । एक क्षण का प्रमाद हमारी जिंदगी भर कि आराधना-साधना को निष्फल बना सकता है ।
- एक बार दानादि सुकृत किया, धर्म क्रिया की, उसे जितनी बार याद करो, अनुमोदना करो, उतनी बार फल मिलता है । और एक बार पाप किया, उसे जितनी बार याद किया, उसका अभिमान किया - प्रशंशा की, उतनी बार वो पाप का दंड बढ़ता जाता है ।
- दिया हुआ दान निष्फल नहीं जाता और पाया हुआ ज्ञान निष्फल नहीं जाता ।
- बिना विवेक किया हुआ व्रत-नियम-पच्चक्खाण पूर्ण फल देता नहीं है ।
- खाने का ज्यादा शौख रखनेवाला अभक्ष्य भी खाता है और ज्यादा बोलनेवाला झूठ, परनिंदा, आत्मप्रशंसा का भी बोल देता है ।
- सब एक दूसरे के पास अधिकार कि अपेक्षा रखे तो आग लगेगी, दुखी बनेंगे । सब अपनी-अपनी फर्ज निभाने लगे तो जीवन बाग़ बन जायेगा, खुशियो से भर जायेगा ।
- दुनियादारी की दृष्टी से, शैतान की दृष्टी से जगत को देखना, वो मिथ्यादर्शन है । प्रभुने जो दृष्टी से जगत को देखा, वो दृष्टी से जगत को देखना, वो सम्यग्दर्शन है ।

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