चेन्नै उपधान प्रवचन - १४/१२/२०१३


 श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:
  • अरिहन्तादि पञ्च परमेष्ठि सम्बन्धी - उनका नाम स्मरण, प्रतिमा पूजन, ध्यान इत्यादि कुछ भी याद करने से मोहनिय कर्म का क्षयोपक्षम होता है । संसार सम्बन्धी जोई भी चीज़ याद करने से मोहनिय कर्म का उदय होता है । 
  • संपत्ति  को याद करने से लोभ पैदा होता है । सम्बन्धो और स्वजनो को याद करने से स्वार्थ और क्रोध भाव पैदा होता है । संसार याने मोहनिय कर्म की लागनी - feeling का बहता बड़ा प्रभाव । 
  • रेलवे की पटरी ट्रैन को चलाती नहीं फिर भी ट्रैन को चलने में मदद करती है, वैसे प्रभु हमारे कर्मो का नाश नहीं करते है लेकिन कर्मो को नाश करने के हमारे पुरुषार्थ में उनका नाम-जाप-ध्यान सहायक बनते है । 
  • सभी पापो का बाप लोभ है, क्रोधादि में सबसे  भयंकर लोभ है । जैन होते हुए भी आदमी बूचड़खाना चलाता है, हिंसात्मक व्यापार करता है । दूसरों के साथ माया,दम्भ,कपट करता है, भाई के साथ भी संघर्ष अन्याय करता है । लोभ सर्व विनाशक है । लोभ से जीव का पुण्य,शक्ति,सभ ख़त्म हो गए । अनंतकाल के बाद मिला मानवभाव एक लोभ के कारण पापो में ख़त्म हो गया । 
  • संसारी के पेट में गया हुआ भोजन पाप में जायेंगा । साधू के पात्र में  गया हुआ भोजन साधना में जायेंगा ।
  • आपके आजुबाजु में रहनेवाले आपके स्वजन, मित्र, पडोसी, हितस्वी वर्ग को पहचान लो - वो आपके वर्त्तमान को सुधारने के नाम पर, आपके पुण्य को खत्म नहीं करते है ना ? आपके भविष्य को नहीं बिगाड़ रहे है ना ? ऐसे हितस्वी से सावधान रहना । 
  • लोभ अग्नि जैसा है - उसमे कितना भी ईंधन डालो, उसे तृप्ति ही होती नहीं । बल्कि वो ज्यादा जलता है, वैसे लोभग्रस्त लोभी को कितना भी रूपया मिले उसे तृप्ति होती ही नहीं है । बल्कि उसका लोभ दिनबदिन बढ़ता ही जाता है ।  

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