प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने सम्बोधित करते हुए कहा कि:
- अनंतकाल से हम सुख ढूंढने के लिए दौड़ते रहे लेकिन जहा जहा सुख ढुंढने निकले वहा वहा हमें दुःख ही मिला । सुख समस्या बनी और दुःख उसका परिणाम बना । अरिहंत प्रभु का सबसे बड़ा उपकार यह है कि - अनंतकाल से दुःख में दुबे हमें अनंतकाल सुख मिले ऐसा मार्ग दिखलाया ।
- जो कार्य का अभ्यास किया जाये, वह कार्य में हम perfect बनेंगे । जो कार्य त्रास कंटाळा के साथ किया जाये वह कार्य का कुछ फल मिलता नहीं है । हमें धर्म के प्रत्येक कार्य - क्रिया रस के साथ अभ्यास के साथ करनी है, जिससे वह धर्म क्रिया के संस्कार, अगले भाव में भी हमारे साथ आए ।
- ९९ मीठी बादाम खाने के बाद एक कड़वी बादाम आयी, तो हमें ९९ मीठी बादाम याद नहीं रहती लेकिन एक कड़वी बादाम बार बार याद आती है । वैसे २० आदमी हमारी प्रशंसा करे वो हमें याद नहीं रहता लेकिन एक आदमी हमारा अपनमान करे तो वह बात हमें २५ साल के बाद भी याद रहती हैं ।
- कष्ट किये बिना धन नहीं मिलता है, तो कष्ट किये बिना धर्म भी नहीं मिलता है । वर्त्तमान में सुखी होने धन चाहिए, तो भविष्य में सुखी होने धर्म चाहिए । ऐसे धर्म को पाने के लिए कष्ट सहन करना ही पड़ेगा ।
- किया हुआ एक भी शुभ कार्य कभी निष्फल नहीं जाता, अवश्य फल देता ही है । सिवाय कि आप वह कार्य का अफ़सोस ना करे ।