चेन्नै उपधान प्रवचन - १९/११/२०१३

प्रवचन प्रभावक  पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने सम्बोधित करते हुए कहा कि:

  • अनंतकाल से हम सुख ढूंढने के लिए दौड़ते रहे लेकिन जहा जहा सुख ढुंढने निकले वहा वहा हमें दुःख ही मिला । सुख  समस्या बनी और दुःख उसका परिणाम बना । अरिहंत प्रभु का सबसे बड़ा उपकार यह है कि - अनंतकाल से दुःख में दुबे हमें अनंतकाल सुख मिले ऐसा मार्ग दिखलाया । 
  • जो कार्य का अभ्यास किया जाये, वह कार्य में हम perfect बनेंगे । जो कार्य त्रास कंटाळा के साथ किया जाये वह कार्य का कुछ फल  मिलता नहीं है । हमें धर्म के प्रत्येक कार्य - क्रिया रस के साथ  अभ्यास के साथ करनी है, जिससे वह धर्म क्रिया के संस्कार, अगले भाव  में भी हमारे साथ आए । 
  • ९९ मीठी बादाम खाने के बाद एक कड़वी बादाम आयी, तो हमें ९९ मीठी बादाम याद नहीं रहती लेकिन एक कड़वी बादाम बार बार याद आती है । वैसे २० आदमी हमारी प्रशंसा करे वो हमें याद नहीं रहता लेकिन एक आदमी हमारा अपनमान करे तो वह बात हमें २५ साल के बाद भी याद रहती हैं । 
  • कष्ट किये बिना धन नहीं मिलता है, तो कष्ट किये बिना धर्म भी नहीं मिलता है । वर्त्तमान में सुखी होने धन चाहिए, तो भविष्य में  सुखी होने धर्म चाहिए । ऐसे धर्म को पाने के लिए कष्ट सहन करना ही पड़ेगा । 
  • किया हुआ एक भी शुभ कार्य कभी निष्फल नहीं जाता, अवश्य फल देता ही है । सिवाय कि आप वह कार्य का अफ़सोस ना करे ।