श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:
- मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग ये पांच कारणो से जीव को प्रत्येक समय कर्म बंध हो रहा है । उसमें भी मिथ्यात्व कि हाजरी में भयंकर क्रूर लेश्या आ जाती हैं, जो जीव को नरकादि दुखो में ले जाता है । जो निकाचित पाप अवश्य भुगतना ही पड़ता है ।
- हमारे अनंत भविष्यकाल को तहेश-नहेश करनेवाला मिथ्यात्व का centrepoint - अहंकार है । अहंकार याने - भगवन के शाशन में बहुत सारी बात कही हुई है लेकिन मैं मेरी बुद्धि में बैठेगी वोही बात करूँगा ।
- श्रद्धा और समर्पण भाव कि प्राप्ति के बिना अहंकार का त्याग नहीं हो सकता ।
- सत्ता और संपत्ति के लालच में ही भारत पर बार बार आक्रमण हुआ है और आज भी सत्ता, संपत्ति के लिए आदमी अपनी वफ़ादारी बेच रहा है । पूरा भारत मात्र स्वार्थ के गणित पर चल रहा है कि - इससे मुझे आर्थिक लाभ क्या होगा ?
- कर्म कि थप्पड़ इतनी भारी है कि - हमारा पुण्य कब खत्म होगा हम जानते नहीं है । और पुण्य खत्म होने बाद समर्थ राजा को भी भीख मांगनी पड़ती है, इसलिए जब तक पांच इन्द्रिय सही सलामत है, शरीर का स्वास्थ्य अच्छा है, बुढ़ापा आया नहीं है, पुण्य टिका हुआ है तब तक धर्म, आराधना, सुकृत कर लो ।
- दुश्मन कितना भी वफादार बने तो भी उस पर विश्वास करना नहीं, वैसे ही हमारे पांच इन्द्रिय और मन पर कभी विश्वास करना नहीं, आज जितनी आराधना कर सके कर लो, कल वो दगा भी दे सकता हैं ।
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