प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने सम्बोधित करते हुए कहा कि:
- सिद्ध भगवंतो को धन्य है कि - जिनको शारीर ही नहीं है । इसी कारण वे किसी भी जीव के कष्ट, पीड़ा, वेदना, दुःख में निमित ही बनते नहीं हैं ।
- जिसे साधू बनने कि इच्छा हो और १२ व्रत के पालन में जो उत्साही हो वोही सच्चा श्रावक हैं ।
- हमें पाप कार्य करने में कोई विघ्न , अन्तराय आते नहीं हैं लेकिन धर्म कार्य करने में विघ्न, अन्तराय आते है । होटल, थिएटर, प्रवास, पिकनिक में कोई विघ्न नहीं आतें लेकिन उपवास, तीर्थ यात्रा, सामायिक, प्रतिक्रमण करना हो तो विघ्न आ जाते हैं । उसके दो कारण है:-
- पूर्व भव में हमने दुसरो को आराधना में सहायक बनने कि जगह उनको विघ्न रूप अन्तराय रूप बने ।
- पूर्व भव में हमने जो धर्म आराधना कि वो आनंद और उत्साह से करने कि जगह भार मानकर की । करनी पड़ रही है ऐसे मानकर जबर्दस्ती कि ।
- भविष्य के लिए planning करना हमारे हाथ में है लेकिन वो planning सफल होना हमारे हाथ में नहीं । वह तो कर्म-भवितव्यता-पुण्य-भाग्य के हाथ में है ।
- दुनिया में दो प्रकार के पुण्य है:-
- स्वदेश पुण्य - जिसको अपने राज्य में ही समृद्धि बड़े, कमाई बड़े
- परदेश पुण्य - जिसको परदेश में जाने के बाद ही समृद्धि बड़े
- दुनिया का ये विचित्र नियम हैं कि - एक महनत करे दूसरा मजा करे ।