श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:
- अरिहन्तादि पांच परमेष्ठि को वंदन करने के पीछे चार आशय है -
- वह सर्वगुण संपन्न है
- मै वो गुणो से रहित हूँ ।
- मुझे वो क्षमादि गुण प्राप्त करने कि इच्छा है और
- ये पांच परमेष्ठी के प्रभाव से मुझे ये क्षमादि गुणो कि प्राप्ति हुई है ।
- जो हमारी वर्तमान जिंदगी को, शान्ति को, समाधि को और सद्गति को विष जहर बनाता है उसे विषय कहते है । पांच इन्द्रिय के अनुकूल एवं आकर्षक विषय जीव के अनंत भविष्यकाल बिगड़ देता है ।
- अनंत जीवो के बीच एक ही शरीर - उसे निगोद कहते है । अनंत जीवो के बीच एक भी शरीर नहीं - उसे निर्वाण कहते है । जिसने अपने शरीर का मोह पकड़कर रखा है वो निगोद में जाता है । जिसने अपने शरीर का मोह छोड़ दिया है वो निर्वाण में जाता हैं ।
- Overconfidence - अतिआत्मविश्वास मारनेवाली चीज़ है ।
- प्रेम से दुसरो को control करे तो वह हमारे अनुयायी बनते है । ताकत से दुसरो पर control करे तो वो हमारे दुश्मन बनते है ।
- हमारा मन हमारा दोस्त नहीं हमारा दुश्मन है, क्योंकि ये मन मोहनीय कर्म का मित्र, जासूस और गुप्तचर है । दुश्मन के मित्र को खुश करने में मजा नहीं आता है । ये मन को खुश करने से ही अनंतकाल से हम दौड़ रहे है ।
- यदि हमारे पेट में दूधपाक हजम न हो , तो दूधपाक खाना ही नहीं । यदि हमारे मन में किसी की गुप्तबाते हजम न हो तो, तो गुप्तबात जानना ही नहीं ।