चेन्नै उपधान प्रवचन - २५/११/२०१३

 श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर(चेन्नई पुलल) में बिराजित प्रवचन प्रभावक पूज्य आचार्य श्री अजितशेखरसूरीश्वरजी मा.सा. ने विशाल प्रवचन सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि:

  • अरिहन्तादि पांच परमेष्ठि को वंदन करने के पीछे चार आशय है - 
    1. वह सर्वगुण संपन्न है 
    2. मै वो गुणो से रहित हूँ । 
    3. मुझे वो क्षमादि गुण प्राप्त करने कि इच्छा है और 
    4. ये पांच परमेष्ठी के प्रभाव से  मुझे ये क्षमादि गुणो कि प्राप्ति हुई है । 
  • जो हमारी वर्तमान जिंदगी को, शान्ति को, समाधि को और सद्गति को विष जहर बनाता है उसे  विषय कहते है । पांच इन्द्रिय के अनुकूल एवं आकर्षक विषय जीव के अनंत भविष्यकाल बिगड़ देता है । 
  • अनंत जीवो के बीच एक ही शरीर - उसे निगोद कहते है । अनंत जीवो के बीच एक भी शरीर नहीं - उसे निर्वाण कहते है । जिसने अपने शरीर का मोह पकड़कर रखा है वो निगोद में जाता है । जिसने अपने शरीर का मोह छोड़ दिया है वो निर्वाण में जाता हैं । 
  • Overconfidence - अतिआत्मविश्वास मारनेवाली चीज़ है । 
  • प्रेम से दुसरो को control करे तो वह हमारे अनुयायी बनते है । ताकत से दुसरो पर control करे तो वो हमारे दुश्मन बनते है । 
  • हमारा मन हमारा  दोस्त नहीं हमारा दुश्मन है, क्योंकि ये मन मोहनीय कर्म का मित्र, जासूस और गुप्तचर है । दुश्मन के मित्र को खुश करने में मजा नहीं आता है । ये मन को खुश करने से ही अनंतकाल से हम दौड़ रहे है । 
  • यदि हमारे पेट में दूधपाक हजम न हो , तो दूधपाक खाना ही नहीं । यदि हमारे मन में किसी की गुप्तबाते हजम न हो तो, तो गुप्तबात जानना ही नहीं ।